पेंशन का कहर!

सुनीता कुमारी, बिहार

मां मैंने नीचे पड़ोस की अनीता आंटी को देखा शायद वही थी? मुझे विश्वास नहीं हुआ उनकी हालत को देखकर; बाल और कपड़े भी अस्त-व्यस्त थे;

 मैंने उन्हे टोका  पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।

पहले तो मुझे लगा कि वह अनीता आंटी है ही नहीं ,पर फिर मैंने जब उन्हें ध्यान से देखा तो अनीता आंटी ही थी । 

मां ऐसा कैसे हो गया?

उनकी ऐसे हालत कैसे हो गई?

मां ने कहा उनके बच्चों ने इन्हें कहीं का नहीं छोड़ा? आज अनीता जी न तो घर की हैं और ना ही घाट की। विक्षिप्त अवस्था की शिकार हो चुकी हैं इनके बच्चों ने हीं उनका जीवन बर्बाद कर दिया?

 मुझे सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ; 

मैं जब छोटी थी, मैं आए दिन अनीता आंटी को स्कूल जाते देखा करती थी, साफ सुथरे इस्त्री की हुई कपड़ों में मैचिंग ब्लाउज और  साथ में मेचिंग चूड़ी और बिंदी लगायी रहती थी, उनका चेहरा दमकता रहता था। उन्हें हर कोई आगे  पीछे से देखता रहता था।

दमकता हुआ चेहरा, चेहरे पर चमक अनीता आंटी की पहचान थी, और हो भी क्यों ना क्योंकि वह गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल की हेड मास्टरनी थी। उनके पतिदेव भी किसी सरकारी संस्था में कर्मचारी थे।

मां बताती थी कि, उनकी अच्छी सैलरी थी उपरी कमाई भी थी।

मेरे मोहल्ले में वह एक प्रतिष्ठित और धन संपदा से परिपूर्ण नामी-गिरामी परिवार में से थे। दोनों  दंपति अच्छे पद पर कार्यरत थे एवं पुस्तैनी संपित्त भी थी। इस कारण से मेरे मोहल्ले में उन्हें सभी सम्मान की नजर से देखते थे ।दोनों का व्यवहार भी लोगों के प्रति अच्छा था।

जिस कारण पूरे मोहल्ले में उनका सम्मान होता था।

हमेशा अनीता आंटी को मैचिंग साड़ी और ब्लाउज मैचिंग  चूड़ी बिंदी के साथ देखा था, आज उसी अनीता आंटी को  मैंने  अस्त-व्यस्त कपड़े, उजड़े हुए बाल के साथ देखा । मुझे बड़ा आश्चर्य और दुःख हुआ। 

मैं  बराबर अपने मायके कोलकाता आती रहती थी। परंतु अनीता आंटी से नहीं मिल पाती थी, क्योंकि मैं मायके में रूकती ही नहीं थी एक दिन दो दिन के लिए आती थी और फिर वापस ससुराल चली आती थी।

इस बार दो-चार दिन के लिए रुकना हुआ और मैं घर के कुछ जरूरी सामान को लेने बाजार गई और वहां मुझे अनीता आंटी मिल गई।

मैंने मां से पूछा ऐसा क्या हुआ था मां जो आज अनीता आंटी की हालत ऐसी हो गई है?

पिछली बार तो तुम बता रही थी कि, अनीता आंटी अपनी बेटी के घर रह रही है, बेटे ने उन्हें घर से निकाल दिया है । बेटी तो अच्छे सी उन्हे रख रही थी फिर?

ऐसा क्या हुआ जो उनकी ऐसी हालत हो गई है?

मां ने कहा बेटी के घर से अनीता जी के छोटे बेटे प्रकाश ने जबरदस्ती अपनी मां को बहला फुसलाकर अपने घर ले आया, परंतु उसकी पत्नी उसकी सेवा और खाने-पीने का ध्यान नहीं रखती है, जिस कारण अनीता जी की ऐसी ऐसी हालत हो गई है।

अनीता आंटी की पेंशन और पुस्तैनी संपित्त उनके सभी बच्चों के लिए झगड़ने की वजह बन गई और अनीता जी की इस दशा के लिए जिम्मेदार है।

हां ये बात तो है मां,

मैं  जब भी मां से मिलने आती मां अनीता आंटी के बारे में बताती रहती थी।

अनीता आंटी की बेटी ने खुद से भाग कर शादी कर ली थी, जिसका सदमा सिंह अंकल नहीं झेल नही पाए और असम में ही दुनिया से चल बसे ।

सिंह जी के जाने के बाद अनीता आंटी पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। बेटी ने भागकर अन्तर्जातीय शादी तो पहले ही कर ली थी, और दोंनो बेटे सिंह जी की नौकरी लेने के लिए झगड़ पड़े। दोनों बेटो में अनुकम्पा की इस नौकरी के लिए इतनी लड़ाई होती रही की बीस साल तक ये फैसला नही हो सका है कि,सिंह जी नौकरी किस बेटे को मिलेगी?

दोनों बेटो की रात दिन की किच किच के कारण अनीता जी धीरे धीरे अपने होश खोने लगी, लड़ाई झगड़े के चक्कर में दोनों बेटों ने ढंग का कोई काम नहीं किया।

जिसकारण मां के पेंशन को लेकर दोनों बेटे रात दिन झगड़ते रहते थे। 

अनीता जी के छोटे बेटे प्रकाश  ने भी अपनी पसंद की लड़की से शादी की। अनीता जी का दुर्भाग्य ही था जो  बहू भी ऐसी आई, जिसने सास को रखना ही नहीं चाहा। बड़ी बहू ने तो पहले ही कन्नी काट ली थी छोटी बहू भी ऐसी ही निकली। दोनों में से किसी ने भी अनीता कि किसी में जिम्मेदारी नहीं ली।

रोज रोज की दोनों बेटों की लड़ाई, दोनों बहू की लड़ाई से परेशान होकर, एक दिन अनीता जी चुपचाप घर से निकल पड़ी और बेटी के घर के पास जाकर बेहोश हो गई ,तब बेटी के ससुराल वालों ने बेटी को तथा दमाद को कहा कि अनीता जी को आप रख लीजिए यह आपकी मां है, आपकी सास के प्रति आपकी भी जिम्मेदारी  बनती है। 

अनीता जी  की बेटी प्रिया और उनके दामाद ने अनीता जी को दस बारह साल रखा परंतु यह बात छोटे बेटे को पसंद नहीं आ रही थी, क्योंकि मां की पेंशन बेटी के हाथ में जा रही थी। सिंह जी का पेंशन और अनीता जी की खुद की नौकरी का पेंशन दोनों मिलाकर अच्छी खासी रकम हो जा रही थी जिसका लाभ बेटी को मिल रहा था।

परंतु बेटी के घर में भी अनीता जी को कल्याण नहीं था बेटी के साथ और ससुर अनीता जी को भला बुरा सुनाते रहते थे और तो और आए दिन उनके दोनों बेटे आकर नेताजी से झगड़ा कर जबरदस्ती घर चलने को कहते थे परंतु अनीता जी की बेटी उन्हें बहुत अच्छे से रख रहे थे इस कारण अनीता जी बेटी के घर से कहीं जाने को तैयार नहीं थी।

यह बात दोनों बेटे को बिल्कुल भी पसंद नहीं थी 10 12 साल तक लगातार मां को घर ले जाने की लड़ाई भाई बहनों के बीच चलती रहे आखिरकार छोटा बेटा कामयाब हो गया। खिलाकर मां को घर ले आया।

घर जाने के बाद जैसी देखभाल बेटी करती थी वैसी देखभाल बहू ना कर सके बेटा भी मां के प्रति लापरवाही रहा पेंशन के रुपयों की लालच में कभी उसे कर्तव्यबोध की अनुभूति ही नहीं होने दी।

जबतक अनीता जी बेटी के पास रही तब तक अनीता जी की तबीयत तबीयत ठीक-ठाक थी , परंतु बेटे के पास आने के बाद धीरे-धीरे उनकी तबीयत बिगड़ती जा रही है ?

वह अपनी मानसिक संतुलन होती जा रही हैं? अब भगवान ही उनके बेटे को सद्बुद्धि दें, जिससे अनीता जी का जीवन बच पाए?

मैं सुनकर दंग रह गई, ऐसा लगा जैसे इंसानी  रिश्तों की कोई कीमत ही नहीं है, अगर जीवन में कुछ है तो वह रुपया है। अनीता जी की पेंशन के रुपयों के लिए दोनों बेटा, बेटी सब आपस मे  झगड़ते आ रहे हैं और बेटी तो मां के लिए कुछ करना चाहती है, मां को रखना चाहती है परंतु भाई के झगड़े से ऊब चुकी है, हालाकि लोभ बेटी के मन में भी है परंतु वह मां के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी समझ रही है

अनीता आंटी के परिवार में सिर्फ और सिर्फ  रुपया पैसा और धन दौलत का ही मोल था, इंसानी रिश्ते थे ही नही। 

मां का बेटे के साथ अगर रिश्ता था, तुम आकर पेंशन की वजह से?

बेटी का मां के साथ रिश्ता था तो सिर्फ मां की पेंशन की वजह से?

अनीता जी  की जिंदगी  खराब हुई तो सिर्फ पैसो की वजह से।

रुपयों के लालच ने इस परिवार को तबाह कर दिया बर्बाद कर दिया जो स्त्री सभ्य और सुसंस्कृत जानी जाती थी, वह आज विक्षिप्त होकर सड़कों पर घूमती हैं, भूखे प्यासे यहां वहां भटकते रहती हैं;

ना तो उनके पास पैसों की कमी है;

और ना ही रहने के लिए घर की कमी है;

सिंह जी ने अपनी कमाई से आलीशान घर बनवाया था;

जिसके फस्ट फ्लोर पर  छोटे बेटे और दूसरे फ्लोर पर उसके बड़े बैठे रहते हैं;

परंतु उस बड़े से मकान में अनीता जी के लिए कोई जगह नहीं है?

यह संपत्ति  अंकल और अनीता आंटी ने दिनरात एक करके जमा की थी, मेहनत करके जमा किए थे, पर आज उन पैसों का अनीता जी के पास कोई मूल्य नहीं है। पैसा रहते हुए भी वह आज भिखारण की जैसी हालत हो गई है।

वही मेरे पापा ने हम दोनों भाई बहनों की परवरिश में कोई कसर नही रखी है, और हमदोनों भाई बहन आज सेटल है हमारे बीच प्रेम भी अच्छा है।

अगर समय पर पैसे का सदुपयोग ना किया जाए तो यही पैसा जीवन में दुख का कारण बन जाता है और यही दुख का कारण अनीता आंटी के लिए बन बन गया। उनका पेंशन उनके लिए आफत बन गया।

उन्होंने अपने बच्चों को संस्कार और शिक्षा देने में कहीं ना कहीं जरूर गलती कर दी है, जिसकी वजह से उनके बच्चे सही मार्ग पर नहीं जा सके। 

अक्सर जिस घर में पति पत्नी दोनों बाहर काम करते हैं उनके बच्चे घर पर अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं, रुपया और सामान देखकर माता-पिता बच्चों को तो जरूर खुश कर लेते हैं परंतु बच्चों को जो चाहिए होता है वह दे नहीं पाते हैं ऐसे ही परिस्थिति में बच्चे सही दिशा की जगह गलत दिशा की ओर चल पड़ते हैं माता पिता को पता ही नहीं चलता है कि उनकी परवरिश में कहां कमी रह गई क्योंकि उन्होंने रात दिन मेहनत करके अपने बच्चों के लिए वह सब क्या होता है जो हमने माता-पिता करते हैं। 

अगर अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा उन्हें दी जाती तो निश्चित ही अनीता जी की आज ऐसी हालत नही होती। उनके पेंशन को लेकर उनके बच्चे झगड़ नही रहे होते।अनीता आंटी का पेंशन उनके लिए आफत बना होता जो पैसा इंसान के जीने का सहारा होता है वही पैसा कभी-कभी इंसान का जीने का सहारा छिन भी लेता है अनीता जी के तीन बच्चे होते हुए भी आज विक्षिप्त है। इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण है पेंशन।

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